धारा 370 पर हमेशा देश की राजनीति में उबाल आता रहा है। आमचुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के सिर्फ इतना कह देने पर की आखिर इस धारा से आम कश्मीरियों को फायदा कितना हुआ पर राजनीतिक दलों ने काफी हौ-हल्ला किया था। जानिए आखिर क्या है धारा-370 का सच।
- भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है।
- 1947 में विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह पहले स्वतंत्र रहना चाहते थे लेकिन उन्होंने बाद में भारत में विलय के लिए सहमति दी।
- जम्मू-कश्मीर में पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले नेशनल कॉफ्रेंस के नेता शेख़ अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने की पेशकश की थी।
- इसके बाद भारतीय संविधान में धारा 370 का प्रावधान किया गया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष अधिकार मिले हुए हैं।
- 1951 में राज्य को संविधान सभा को अलग से बुलाने की अनुमति दी गई।
- नवंबर, 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया।
विशेष अधिकार
- धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित क़ानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए।
- इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
- 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। सूचना का अधिकार कानून भी यहां लागू नहीं होता।
- इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कही भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते हैं।
- भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है।वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
- राज्य की महिला अगर राज्य के बाहर शादी करती है तो वह यहां की नागरिकता गंवा देती है।
इसलिए इसे विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। यह अनुच्छेद राज्य को विशेष दर्जा सुनिश्चित करता है। इसके अलावा सिर्फ अनुच्छेद 370(1) है जो राज्य पर लागू होता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 370(1) के तहत राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह संविधान के किसी भी प्रावधान को राज्य में लागू कर सकते हैं। अपवादस्वरूप राज्य सरकार से विचार-विमर्श भी जरूरी है। उन्हें किसी भी प्रावधान को लागू करने, उसमें संशोधन करने या उसके किसी हिस्से को हटाने का भी अधिकार है।
आपको बता दें कि राज्य में लागू अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग उठती रही है। राज्य में भाजपा सरकार की सहयोगी पीडीपी इसे हटाने की मांग करती रही है। हालांकि, भाजपा इसे हटाने के पक्ष में नहीं है। पहले यह सहमति कश्मीर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने वाले महाराजा, फिर (बाद में) सदरे रियासत से ली जाती थी।अब, संशोधन कर सदरे रियासत की जगह राज्यपाल कर दिया गया है। इस अनुच्छेद का वह प्रावधान हमेशा से विवादास्पद रहा जिसमें कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों के हमेशा बहुसंख्यक बने रहने का इंतजाम है। यानी प्रावधान यह है कि भारत के किसी भी क्षेत्र का नागरिक कश्मीर में जाकर न तो स्थायी तौर पर रह सकता , न कोई अचल संपत्ति खरीद सकता है और न ही स्थायी तौर व्यापार कर सकता है। (कश्मीर से जुड़े हिमाचल के हिस्से पर भी यह कानून लागू है) जबकि देश के बाकी राज्यों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं हैं। समय-समय पर सुझाव आता रहा कि कश्मीर के मस्लिमों को देश के बाकी राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में भेजकर वहां हिंदुओ या अन्य को बसा दिया जाए अथवा कश्मीरी लोगों के वहीं रहते हुए भी राज्य को हिंदू बहुल बना दिया जाए तो पाकिस्तान की तरफ से खड़ी होने वाली समस्याओं का हमेशा के लिए निदान हो जाएगा।
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