Tuesday, 12 July 2016

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (AZAADI KE GUNEHGAAR)

मुद्दा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और बहुत बरे मानवीय मुल्यो को समझने बाले संत गांधी जी अर्थात बापु से जुड़ा है, तो इसका संवेदनशील होना लाजमी है। जहाँ तक मेरा और इस लेख का तात्पर्य सिर्फ ये बताना है कि देश जिन जिन समस्याओ से आज ग्रसित है, वास्तविकता मे उन समस्याओ का बीज तो आजादी के साथ साथ हमने अंग्रेजी हुकुमत से आयात किया था और इसके जिम्मेदार हस्तियो मे एक नाम गांधी जी का है या ये कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि सबसे बड़े जिम्मेदार इन समस्याओ के लिए गांधी जी है जिनकी सहमति ने देश का शायद पुर्ण आजादी से वंचित कर दिया। बुद्धिजीवियो की माने तो भारत को आजादी ट्रांसफर औफ पावर एक्ट के तहत दी गई और उस वक्त के महानुभावो ने उसको स्वीकारा लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी वो दस्तावेज आमजनता के बीच नही रखा गया जिससे कि यथास्थिति साफ हो जाती कि जुगारु आजादी के पीछे क्या खिचड़ी पकाई गई थी,ये अपने आप मे एक रहस्यमय सवाल है और इसका जबाब आना बांकी है? जब देश हमारा तो फिर देश को आजादी ट्रांसफर औफ पावर से क्यो? भारत के महानुभावो महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु जी, जिन्ना साहब जैसे हस्तियो ने भारत का बटबारा स्वीकार कर लिया वो भी ततछन, ये दुसरी सबसे बड़ी वजह है, हमारे शक की कि हमे सिर्फ जुगारु आजादी मिली अगर ऐसा नही होता तो हम देशवासी ये तय करते कि हमे देश का विभाजन करना है या नही, ना कि गोरा शासक हमे देश बांटने का फैसला सुनाता। गांधी जी देश के लोकप्रिय और मानवीय मुल्यो को और फैसले से होने वाले विभिषिका से भली भांती अवगत थे और इसिलिए फैसले के बाद अपने आप को बंगाल के एक कमरे मे बंद कर लिया था और देश ने देखा मानवता का खुला नरसंहार जिसके जख्म आज भी दोनो तरफ हरे है और भारत-पाकिस्तान के बीच नफरत की ये सबसे बड़ी वजह है। गांधी जी कि विवशता ने ही, ऐसे नरसंहार को जन्म दिया और मानवता के इतने बड़े पुजारी की चुप्पी ने नरसंहार हो जाने दिया। अगर गांधी जी अड़ जाते और बंटबारा के शर्तो को नही मानते तो, देश इतने बड़े नरसंहार का गवाह बनने से बच जाता। जवाहर लाल जी और जिन्ना जी की महात्वाकांक्षा तो जग जाहिर थी, लेकिन गांधी जी की स्वीकृति ने विभिषिका हो जाने दिया। अगर गांधी जी की अहिंसा ने थोड़ा और धैर्य रखा होता तो हम देशवासी अंग्रेजी हुकुमत के आखिरी प्यादे तक कि कब्र खोद, बिना शर्त आजादी ली होती और फिर हम देशवासी मिल बैठ कर ये फैसला करते कि हमे साथ रहना है या नही, अगर हम बातचीत से विभाजन का फैसला लेते तो वैसे नरसंहार को टाला जा सकता था और दोनो देशो के बीच सौहार्द भी बना रहता, लेकिन गांधी जी जैसे सख्सियत का दबाब मे झुक जल्दबाजी मे लिए गए फैसले ने दोनो देशो को अमिट जख्म दिए, जिसकी किमत दोनो देश आज भी भुगत रहा है जिसमे भारतीय मुस्लमान और पाकिस्तानी मुस्लमान शामिल होते है और बदले की कार्यवाई के तौर पर हिंदु संगठन भी हिंसा पर उतारु हो जाते है और दोनो ही तरफ युवाओ कि फौज है, बस जरुरत इतनी है कि आप सिर्फ सहानुभुति से जख्म कुरेद दीजिए और बस देखिए कि कैसे साथ साथ रहने वाले हो या सीमापार वाले एक दुसरे को मरने मारने पर उतारु हो जाते है, ये समस्या बिना बिचारे, बिना संवाद और दबाब मे लिए गए भारत के विभाजन के फैसले का नतीजा है और ये तब और विस्फोटक हो जाता है, जब सियासी दल इस मुद्दे पर सियासत की गंदी रोटी सेकती है और नतीजा होता है, सिर्फ मौत और तबाही और इंसान कसाब जल्लाद बन कहर बरपा मासुमो के खुन से धरती नापाक कर देता है और कसाब अकेला जल्लाद नही बल्कि ऐसे हजारो जल्लाद कसाब देश के बाहर और देश मे मौजुद है।सियासतदान जबतक जख्म कुरदते रहेंगे, ऐसे कई जल्लाद कसाब हमारे देश को लहु लुहान करते रहेंगे।
देश आज जो मुख्य दो समस्याओ जैसे भ्रष्टाचार कालेधन से ग्रस्त है और देश मे आंदोलनो का दौड़ चला हुआ है, उसके पीछे भी जुगारु आजादी जिम्मेदार है और भारतीय अंग्रेज जवाहर लाल नेहरु जी जिन्होने अंग्रजो के लुट के नीति को आगे बढाया, वो सबसे बडे जिम्मेदार राजनीतिक सख्सियत है, जिनके वंशज की सरपरस्थी मे, ये अंग्रेजो का अधुरा लुट का हसरत आज भी पुरी हो रही है और भ्रष्टाचारी, बेईमान व्यापारी, कालाधन माफिया आज भी विदेशी तिजोरी भर रहे है। भ्रष्टाचार और कालाधन खुद मे तो समस्या है ही, साथ-साथ अन्य समस्याओ की वजह भी है। 1947 मे आजादी मिली और हमने संविधान बनाया और वो भी अधुरे क्योकि ज्यादा तर चीजे तो हमने आयात किए, वहाँ भी हमारी स्वदेशी सोच असफल हो गई और हमे अग्रेजी कानुन और अग्रेजी व्यवस्था मजबुरी मे या पाबंदी थी या उससे अच्छी कोई व्यवस्था नही थी, ऐसे कई सवाल उठते है क्योकि आजादी हमारी तो कानुन और व्यवस्था किसी और का क्यो? यहाँ भी वही सवाल कि क्या विभाजन की तरह कानुन और व्यवस्था जो ब्रिटिशो का था, उसको भी अंगीकार करने की वैधता थी? आईपीसी (इंडियन पिनल कोड) जिसके आधार पर हमारी पुलिस और जाँच ऐजेंसिया किसी भी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत पंजीकृत करती है और उसके खिलाफ तहकीकात करती है। लेकिन अब इस आईपीसी पर नजर डालिए, इस कानुन को अंग्रेजी हुकुमत ने 1860 मे बनाया था और ये आज भी आजाद भारत का कानुन है, इससे ज्यादा शर्मनाक आजादी का स्वरुप नही हो सकता, लेकिन हमारे देश को कानुन व्यवस्था देने के लिए ये अंग्रेजी शर्मनाक ग्रंथ आईपीसी आज भी प्रभावी है। ये आईपीसी 1860 मे अस्तित्व मे आई थी,जबकि 1857 मे आजादी की पहली लड़ाई जिसे सैनिक विद्रोह का नाम दिया गया था और उस आंदोलन को बर्बरता पुर्वक अंग्रेजो ने कुचला था और ठीक तीन साल बाद आईपीसी कानुन लाया गया जिसका मकसद था, अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ उठते आवाजो को दबाना। क्या आप देशवासी ये सोचते है कि अंग्रेजो ने भारतीय हितो को ध्यान मे रखकर ये आईपीसी बनाया था, नही ये अंग्रेज कानुन का सहारा ले आजादी के लिए उभरे विरोध को दबाने के लिए बनाया था। और अगर गुलामी का वो कानुन आज भी मौजुद है, तो इससे ज्यादा शर्मनाक आजादी का नजारा नही हो सकता। अंग्रेजो का कमीनापन यही नही खत्म हुआ, देश और दुनिया को धोखा देने के लिए स्वतंत्र न्यायलय गठित कर दिया। देश गुलाम, न्याय स्वतंत्र क्या आपके गले उतरेगा? अगर न्याय और कानुन भारतीयो के लिए होता तो बहसी जनरल डायर को कानुन पकड़ता और आदालत फाँसी देती ना कि उधम सिंह जी जैसे देशभक्त को अंग्रेजो के मुल्क मे जा उसका कत्ल करना पड़ता। कानुन तब भी बड़े लोगो, साहबो, राजा-महाराजा, जमींदारो, इत्यादी के तलबे चाटती थी और आज भी हालात गुलामी के दिनो से ज्यादा बेहतर नही है।गरीब तब भी न्याय के लिए तरसते थे और आज भी। दुसरी व्यवस्था अदालत जहाँ कानुन पर आखिरी फैसला लगता है,लेकिन तरीका वही अंग्रेजो वाली कि पुरी सुनवाई तो पब्लिक मे लेकिन फैसला प्राइवेट मे बंद कमरे मे लिए जाते थे और अगर मामला गोरो का होता था, तो सुनवाई का ढोंग कर मामला लिपटा दिया जाता था, आज भी वही अदालत वही व्यवस्था और वही खेल जारी है। आजादी के दीवाने भगत सिंह ने फैसला सुनाने वाले अंग्रेज जज से कहा था कि एक तो सफेद काम करो और फैसला मौत का ही सही सरे दरवार सुना दो,लेकिन अंग्रेज जज हिम्मत नही जुटा पाया और बाद मे अंग्रेजी हुकमरान के दखलआंदाजी पर गुप चुप तरीके से मौत का फरमान जारी कर दिया और आनन-फानन मे फांशी की तामिल कर दी। सिर्फ निजाम बदला है, कानुन वही और अदालते वही और मानसिकता तो उससे भी ज्यादा गिर गया, ऐसे मे कानुन चाहे भ्रष्टाचार के लिए हो या कालेधन के लिए,आप ताल ठोकते रहे और गिरगिराते रहे और साथ मे जपते रहे ये मंत्र- देदो मनमोहन, दिला दो राहुल, देने वाली सोनीया माई। अगर भ्रष्टाचार के विरुध कानुन आ भी जाए तो भी कोई फायदा नही जबतक अंग्रेजो का आईपीसी और अदालती व्यवस्था मौजुद रहेगा।

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